Kashmir: पिछले कुछ सालों में भारत की राजनीति और नीतियों को लेकर देश-विदेश में लगातार चर्चा होती रही है। खासतौर पर कश्मीर, सुरक्षा, निगरानी और सरकारी कार्रवाई के तरीकों को लेकर। अब इन बहसों के बीच एक सवाल बार-बार उठता है क्या Narendra Modi के नेतृत्व में भारत ने सचमुच वह रास्ता चुना है, जिसे कई लोग “Israel Model” कह रहे हैं?
Kashmir में बदला हुआ भारत का नजरिया

2019 के बाद से कश्मीर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अनुच्छेद 370 हटने के बाद लंबे समय तक सैन्य लॉकडाउन, संचार बंदी औरं और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। उस दौर में सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि भारत समर्थक माने जाने वाले कश्मीरी नेता भी हिरासत में लिए गए। इसी माहौल में यह बहस तेज हुई कि सरकार कश्मीर को एक “सुरक्षा समस्या” के रूप में देखने लगी है, न कि एक राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे के तौर पर।
‘Israel Model’ का जिक्र और बढ़ती नजदीकियां
2019 में न्यूयॉर्क में एक निजी कार्यक्रम के दौरान भारत के एक वरिष्ठ राजनयिक द्वारा “Israel Model” अपनाने की बात कैमरे में कैद हो गई थी। उस बयान का संदर्भ कश्मीर में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास से जोड़ा गया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ बसावट तक सीमित सोच नहीं थी।
Kashmir पिछले एक दशक में भारत और Israel के रिश्ते रक्षा, निगरानी तकनीक और रणनीतिक साझेदारी से कहीं आगे बढ़ गए हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, अब यह संबंध शासन के तरीकों और सुरक्षा नीतियों तक भी फैलता दिख रहा है।
विचारधाराओं की समानता की दलील
Kashmir राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस नजदीकी की जड़ें विचारधारा में हैं। Bharatiya Janata Party की राजनीति जिस हिंदुत्व विचारधारा से जुड़ी मानी जाती है, उसकी तुलना कई लोग इज़राइल की ज़ायोनिस्ट सोच से करते हैं। दोनों ही खुद को एक “सभ्यतागत राष्ट्र” के रूप में देखते हैं और अल्पसंख्यकों को जनसांख्यिकीय और सुरक्षा चुनौती के रूप में पेश करने के आरोप झेलते रहे हैं। यही वजह है कि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत-इज़राइल संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं।
Bulldozer Politics और उसकी तुलना
भारत के कुछ राज्यों में हाल के वर्षों में घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाए जाने की घटनाएं सुर्खियों में रहीं। अक्सर ये कार्रवाई धार्मिक तनाव, विरोध प्रदर्शनों या कानून-व्यवस्था के नाम पर की गईं। आलोचकों का कहना है कि कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
Kashmir इसी को लेकर तुलना इज़राइल से की जाती है, जहां फिलिस्तीनी इलाकों में लंबे समय से घर गिराने की नीति अपनाई जाती रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में इस तरह की कार्रवाइयों को देखकर “Israel Model” वाली बहस और गहरी हो गई है।
Modi युग में बदला भारत-इज़राइल रिश्ता
Modi सरकार के तहत भारत ने फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी पारंपरिक संतुलित नीति से हटकर इज़राइल के साथ खुली दोस्ती दिखाई है। रक्षा सौदे, निगरानी तकनीक और सुरक्षा सहयोग लगातार बढ़े हैं। आलोचकों का आरोप है कि इसके साथ-साथ भारत ने इज़राइल की कुछ प्रशासनिक और सुरक्षा रणनीतियों को घरेलू स्तर पर अपनाना शुरू कर दिया है।
समर्थकों का कहना है कि यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत शासन के लिए जरूरी है, जबकि आलोचक इसे लोकतंत्र और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए खतरा मानते हैं।
सवाल जो अभी बाकी हैं

क्या भारत सचमुच इज़राइल की राह पर चल रहा है, या यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा जरूरतों का नतीजा है? क्या कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में अपनाई जा रही नीतियां स्थायी समाधान देंगी, या वे समाज में और गहरी दरारें पैदा करेंगी? ये सवाल आज भी खुले हैं और शायद आने वाले सालों में ही इनके जवाब साफ तौर पर सामने आएंगे।
Disclaimer: यह लेख मीडिया रिपोर्ट्स, विश्लेषकों की राय और सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करते और केवल जानकारी देने के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विभिन्न स्रोतों का अध्ययन करें।
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