Iranian टेलीविजन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने हाल के युद्ध की कवरेज में झूठे और विकृत दृश्य पेश किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर दिखाए गए वीडियो और तस्वीरें वास्तविकता से भटकाकर जनता को प्रभावित करने के लिए हैं।
इस प्रोपेगंडा का उद्देश्य देशवासियों और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों दोनों पर विशेष संदेश देना है, जिससे युद्ध को एक पक्षीय नजरिए से दिखाया जा सके।
सोशल मीडिया पर फैलाया गया प्रोपेगंडा

सोशल मीडिया पर कई वीडियो और इमेजेज़ वायरल हुई हैं, जिन्हें मीडिया ने युद्ध की वास्तविक घटनाओं के रूप में पेश किया। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से कुछ सामग्री पुरानी या एडिटेड है, जिससे जनता की धारणा बदलना आसान हो जाता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि सोशल मीडिया अब केवल सूचना का माध्यम नहीं बल्कि राजनीतिक और सैन्य एजेंडा का हिस्सा बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय चिंता
International observers ने इस बात पर चिंता जताई है कि Iranian मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स युद्ध को लेकर सत्यापन रहित खबरें फैला रहे हैं। इससे संघर्ष क्षेत्र में गलत समझ और तनाव बढ़ने की संभावना है।
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति युद्ध की सच्चाई को छुपाकर जनता और विरोधियों को भ्रमित करने की कोशिश है।
मीडिया की जिम्मेदारी
इस स्थिति ने मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। युद्ध जैसे संवेदनशील विषय पर फेक या एडिटेड सामग्री पेश करना न केवल आंतरिक बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संकट पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मीडिया को सत्यापन और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए, खासकर ऐसे संवेदनशील मामलों में।
जनता पर असर

इस तरह की कवरेज का सबसे बड़ा असर जनता पर होता है। लोग वास्तविक घटनाओं से दूर होकर केवल प्रोपेगंडा संदेशों पर भरोसा कर लेते हैं। इससे सामाजिक और राजनीतिक धारणा भी प्रभावित होती है।
Iranian TV और Social Media का यह प्रोजेक्ट युद्ध की सच्चाई को विकृत कर जनता तक पहुंचा रहा है। यह मामले मीडिया नैतिकता, सत्यापन और प्रोपेगंडा के बीच संतुलन की महत्वपूर्ण जरूरत को दर्शाता है।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। वास्तविक घटनाओं और मीडिया रिपोर्ट्स में अंतर हो सकता है।
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