News: पिछले कुछ दिनों से “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” को लेकर देशभर में जबरदस्त चर्चा चल रही है। कभी सोशल मीडिया पर, कभी संसद में और अब सीधे सुप्रीम कोर्ट तक यह मुद्दा पहुंच चुका है। हाल ही में सामने आए आंकड़े और घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था वाकई उतनी पारदर्शी और मजबूत है, जितनी हम मानते आए हैं।
लोकसभा में पेश आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
News फरवरी 2026 में लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, साल 2016 से 2025 के बीच देश में बैठने वाले जजों के खिलाफ 8,600 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं। यह संख्या अपने आप में चौंकाने वाली है। इनमें सबसे ज्यादा शिकायतें 2024 में सामने आईं, जब एक साल में 1,170 मामलों की बात दर्ज की गई। 2025 में भी यह आंकड़ा 1,100 से ऊपर रहा।

इसके उलट 2020 ऐसा साल रहा, जब शिकायतों की संख्या सबसे कम थी, लेकिन तब भी 500 से ज्यादा शिकायतें सामने आईं। ये आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि समस्या नई नहीं है, बल्कि सालों से धीरे-धीरे बढ़ती चली आ रही है।
NCERT की किताब और सुप्रीम कोर्ट की सख्त प्रतिक्रिया
इस पूरे विवाद को और हवा तब मिली, जब NCERT की कक्षा आठवीं की सोशल साइंस की किताब में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” का जिक्र किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और NCERT से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने यहां तक कह दिया कि यह पता लगाना होगा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है और जरूरत पड़ी तो सख्त कार्रवाई भी होगी। कोर्ट ने पूरी किताब पर रोक लगाने का आदेश दे दिया।
News हालांकि, इस सख्ती के बाद एक बड़ा सवाल यह भी उठा कि क्या मुद्दे को दबाने से समस्या खत्म हो जाएगी, या फिर असल जरूरत इस पर खुलकर बात करने की है।
शिकायतों पर कार्रवाई कैसे होती है?
अगर किसी जज के खिलाफ शिकायत आती है, तो सबसे पहले उस पर इन-हाउस मैकेनिज्म के तहत जांच होती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ शिकायतें सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश को जाती हैं, जबकि हाईकोर्ट के जजों के मामलों को उस हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देखते हैं। अगर मामला गंभीर लगे, तो एक आंतरिक समिति बनाई जाती है। जांच में अगर आरोप बेहद गंभीर पाए जाते हैं, तो जज से इस्तीफा देने तक को कहा जा सकता है।
News लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया बहुत ज्यादा बंद दरवाजों के पीछे होती है, जिससे आम लोगों को पारदर्शिता नजर नहीं आती।
चर्चित मामलों ने हिलाई व्यवस्था
News पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने न्यायपालिका की छवि को गहरी चोट पहुंचाई। दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर से भारी मात्रा में नकदी मिलने का मामला हो या फिर ट्रिब्यूनल से जुड़े विवाद, इन घटनाओं ने आम जनता के भरोसे को झकझोर दिया। कुछ मामलों में आंतरिक जांच के बाद इस्तीफे और बर्खास्तगी तक की नौबत आई, लेकिन कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव
बीते एक दशक में सरकार और न्यायपालिका के रिश्ते भी कई बार तनावपूर्ण रहे हैं। जजों की नियुक्ति से लेकर संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल तक, दोनों के बीच कई मुद्दों पर खुलकर टकराव देखने को मिला। नेताओं के बयानों और पूर्व जजों की टिप्पणियों ने इस बहस को और तीखा बना दिया है।
अब आगे क्या?

News इन तमाम घटनाओं और आंकड़ों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिस्टम में सुधार की जरूरत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शिकायतों की जांच प्रक्रिया को और ज्यादा पारदर्शी बनाना जरूरी है, ताकि आम जनता का भरोसा कायम रह सके। सिर्फ आलोचना से नहीं, बल्कि ठोस सुधारों से ही न्यायपालिका की साख को मजबूत किया जा सकता है।
न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती है। लेकिन जब उसी पर सवाल उठने लगें, तो चुप रहना समाधान नहीं होता। आंकड़े बताते हैं कि समस्या मौजूद है और अब वक्त है कि उस पर गंभीर, ईमानदार और खुली चर्चा हो।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार रिपोर्ट्स और आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल पाठकों को सूचित करना है। किसी व्यक्ति या संस्था पर व्यक्तिगत आरोप लगाना इसका उद्देश्य नहीं है।
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